जुगनू

गर्मी की छुट्टियों का पहला दिन गाँव में कब निकल गया, पता ही नहीं चला। हर दिन की तरह रात होते ही वो आज भी गद्दे और बिछौने लेकर छत पर चला गया और अपने दादी-दादा के पास आकर लेट गया …

थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी …

आप कह सकते हैं कि यह फ़िल्म भी अन्ततः स्त्री को ही पुरुष के हर कृत्य के परिणाम को स्वीकार करने को बाध्य होना सिखाती है। लेकिन, दरअसल यह फिल्म अपने नेपथ्य में समाज के इसी कुचरित्र को सफलतापूर्वक उजागर करती है …

तीस्ता मैं …

तीन स्रोतों से मुझे है नाम मिलता,
सृषि के तीनों गुणों को हूँ समेटे,
मैं नदी हूँ …
यह प्रवाहोल्लास मेरा!
भङ्गिमा कल्लोलिनी मेरी! …
पाट मेरा, घाट मेरे,
सोच, फिर! प्रतिघात मेरे …
तीस्ता मैं …

Samskriyā Launches Program “Prākṛti”

On 15th September 2019,  Samskriyā launched the Program “Prākṛti” for the artforms originated, developed and adapted in Bhārata at Unmukt Creativity Center, Bhubaneswar. The event started with the monthly Baithaka of the Program Sambhāshā. In the second half of the event, the Program Prākṛti was officially launched with its first workshop on Madhubani for Beginners …

जोखनी की माँ

‘जोखनी की माँ’ दरअसल हमारे घर की ‘आपातकालीन सुविधा’ थी जो हमारी कामवाली बाई के अचानक काम पर न आने से चार बच्चों वाले घर में मची अफ़रातफ़री को कम करने में अम्मी का हाथ बँटा देती थी । वो मुझे और मेरी बहनों को ‘मईयाँ’ कहती थी। …