थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी …

आप कह सकते हैं कि यह फ़िल्म भी अन्ततः स्त्री को ही पुरुष के हर कृत्य के परिणाम को स्वीकार करने को बाध्य होना सिखाती है। लेकिन, दरअसल यह फिल्म अपने नेपथ्य में समाज के इसी कुचरित्र को सफलतापूर्वक उजागर करती है …

तीस्ता मैं …

तीन स्रोतों से मुझे है नाम मिलता,
सृषि के तीनों गुणों को हूँ समेटे,
मैं नदी हूँ …
यह प्रवाहोल्लास मेरा!
भङ्गिमा कल्लोलिनी मेरी! …
पाट मेरा, घाट मेरे,
सोच, फिर! प्रतिघात मेरे …
तीस्ता मैं …

ख़ुदा की चाल

अगर सोचो हक़ीक़त में, ख़ुदा की चाल निकली तो.. हमारा साँस लेना क्या पता मालूम करना हो ! कि जैसे हम.. हर इक शय जाँचते हैं और परखते हैं.. ख़ुदा हमको बनाकर उम्र भर बस देखता हो तो ! अगर उसकी निगाहों में ग़लत शय हम भी निकले तब, हमारे साँस लेने का कोई मतलब…