UDAIPUR, the city of lakes or the Venice of the east, no tagline will ever be enough to actually define the beauty of this place. It offers numerous places for the visitors to enjoy the feast of nature through naked eyes. One such place of Udaipur is Moti Magri or the Pearl Hill, as it is popularly known as, overlooks the Fateh Sagar Lake in the city. Atop the Moti Magri is the memorial of the Rajput hero Maharana Pratap, which has a bronze statue of the Maharana astride his favourite horse 'Chetak'. Udaipur is an inspiration to many artists as they love to paint the scenarios live on the canvas. I being an artist, have always enjoyed painting Udaipur live. But this time I thought of doing something creative because there should be no end to creativity. During my recent visit to Moti Magri with one of my friend, Jainil Dixit I stopped at the place where the statue of the hero of Udaipur stands proudly and here was I sketching it the next moment. As it was done I asked my photographer friend to click it in a way that the real statue gets replaced by the handmade piece. And here it is, the final result in front of you all.

Tributes to Maharana Pratap

आज कुम्भलगढ़ और हल्दीघाटी की पुण्य-प्रसूता भूमि का वन्दन करने का दिन है, विशुद्ध ‪#‎भारतीयता‬ के शौर्य, मूल्य एवं आत्माभिमान के हेतु किये गए त्याग और बलिदान पर गौरव करने का दिन है, चित्तौड़ के संघर्ष की चेतना और घास की रोटियों की तपस्या से प्रेरणा लेने का दिन है..

कदम-कदम बढ़ाए जा…

जब तक हिन्दुस्तान है तब तक “जय हिन्द” की गूँज कायम है, जब तक यह गूँज है तब तक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र करोड़ों भारतीयों के ह्रदय को राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर प्रेरित करते रहने के लिए प्रकाशित है … यह देश जीता रहे, हमें आशीष देता रहे …

ख़ूनी हस्ताक्षर . .

आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष के महनीय यज्ञ में दी गयी पूर्णाहुति के समान था। हजारों की सेना “दिल्ली चलो” के उद्घोष के साथ बर्मा के रास्ते मणिपुर की तरफ कूच कर गयी थी और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” जैसे आह्वान को सुनकर उन दिलेरों ने मानो भारत-माता के चरणों का लाल महावर से शृंगार ही किया था …
“मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो..”