दूरियाँ

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एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …

कोई दस्तक हृदय पर यूँ देकर गया
आज भी थाप उठती है इस द्वार पर
खोल कर खिड़कियों को ही देखा किये
द्वार रोता रहा प्रेम की हार पर

तोड़ भी दे नियम सारे संसार के
जल सकेगा कहाँ तक अकेला दिया ?
एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …

एक मुस्कान मुख पर सजाए हुए
नयन में एक कसक को छुपाती रही
फूटकर वेदना में हृदय रो पड़ा
स्वप्न जगते रहे, मैं सुलाती रही

बीज स्वप्नों का खिल भी गया एक दिन
मौन फिर भी रहेंगी ये किलकारियाँ !
एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …

भावनाओं में उठते भँवर ने कहा
यूँ फिसलकर मेरा हाथ तुम थाम लो
शोर करते हुए इस जहाँ से परे
आँख को मूँद लो, बस मेरा नाम लो

एक क्षण को भी आँखें अगर मूँद लीं
जाने कब तक जगाएँगी ये सिसकियाँ !
एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …

हमने इतना पुकारा उसे हर जगह
खोल कर हर गिरह आत्मा से लड़े
शब्द छूने को उसको निकल तो गये
देख कर देहरियाँ जाग कर गिर पड़े

लाँघकर गर निकल भी गए दो क़दम
क्या बुलाएँगी वापस कभी देहरियाँ ?
एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …

बढ़ते-रुकते पगों से उलझते रहे
सारे पहरों को हमने शिथिल कर दिया
चन्द्रमा को कभी सूर्य कहने लगे
सूर्य को यूँ कभी चन्द्रमा कर दिया

जान कर भी नहीं कुछ समझते हुए
आप पर ही गिराते रहे बिजलियाँ !
एक रेखा स्वयं से बनाई हुई
ख़ुद ही मिटने लगी देख कर दूरियाँ …


गीत: आरोही श्रीवास्तव
चित्र: स्वातिश्री प्रधान

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