जुगनू

शहर की हलचल से कोसों दूर माधव अपने गाँव में छुट्टियाँ बिताने आया था। यूँ तो माधव दिल्ली में अपने चाचा के यहाँ रहकर पढ़ाई कर रहा था, मगर गाँव आने के ख़याल से हमेशा
उसके अन्दर अलग ही उत्साह रहता था। इतनी कम उम्र में ही उसने अपने माता-पिता को एक दुर्घटना में खो दिया था जिसके बाद ही उसके दादी-दादा ने उसे सँभाला और पढ़ाई में उसकी रूचि देखकर उसके चाचा उसको अपने साथ दिल्ली ले गए। दिल्ली में उसका मन तो लगता था पर जब भी छुट्टियाँ होतीं, उसके माता-पिता की यादें उसे गाँव ही बुला लेतीं। अभी महज़ छठी कक्षा में ही था। माँ-बाप को गुज़रे हुए तीन साल ही
तो हुए थे, और उसको शहर आये हुए २ साल।

गर्मी की छुट्टियों का पहला दिन गाँव में कब निकल गया, पता ही नहीं चला। हर दिन की तरह रात होते ही वो आज भी गद्दे और बिछौने लेकर छत पर चला गया और अपने दादी-दादा के पास आकर लेट गया।
“आज भी लगता है लाइट नहीं आएगी”, माधव ने मायूस होकर कहा।
“कोई बात नहीं हमारी तो आदत ही है, और आज तो हवा भी अच्छी चल रही है”, दादाजी ने उसे समझाते हुए कहा।
सभी उस मन्द-मन्द हवा के झोंकों का आनन्द ले रहे थे। हालाँकि गर्मी की रात थी पर आज पुरवैया चल रही थी। माधव के दादा उससे दिल्ली का हाल चाल ले रहे थे और फिर सवाल शुरू हुए जैसे पढ़ाई कैसी चल रही है, खाना खाते हो कि नहीं ठीक से, दोस्त कैसे हैं, टीचर्स कैसे हैं, और भी न जाने कितने ही सवाल। वह जब भी वापस आता, उसको उनका उत्तर देना होता था। जब सवालों का सिलसिला ख़त्म हो गया तब अचानक छत पर सन्नाटा छा गया। हवा की आवाज़ कानों में सुनाई दे रही थी। आसमान साफ़ था और तारे भी मानो उस हवा का आनन्द लेकर टिमटिमा रहे थे। वहीं घर के पास ही एक पीपल का पेड़ था और वह पेड़ सितारों से सजी हुई दुल्हन सा मालूम हो रहा था। नहीं, कोई आर्टिफिशिल लाइट या झालर नहीं लगी हुई थी उस पेड़ पर। यह उस प्रकृति का अनूठा सा तोहफा ही था जो शहर से दूर प्रदूषण रहित जगहों पर ही देखने को मिल सकता था। ये तारे जो पेड़ पर थे वो जुगनू थे, जिन्होंने पूरे पेड़ को अपनी आगोश में ले रखा था।

माधव उस पेड़ को देख रहा था। तभी उनमें से एक जुगनू उसकी तरफ आकर मँडराने लगा। ऐसा नहीं था कि जुगनू उसने पहली बार देखा था। पर हाँ, इतने पास से जुगनू को देखकर आज वह थोड़ा सोच में डूब गया और कुछ देर बाद ही उसने अपने दादा जी से कहा-“दादाजी ये जुगनू कितने अजीब होते हैं न”।

दादाजी की अब तक आँख लग चुकी थी मगर दादी अभी भी जाग रही थीं, “क्यों बेटा ऐसा क्या देखा इन जुगनुओं में?”
“दादी देखिये न कितने छोटे होते हैं और जैसे तारे टिमटिमाते हैं ये भी वैसे ही टिमटिमाते हैं, ऐसा लगता है कि ये तारे ही नीचे आ गए आसमान से।” यह सुनते ही दादी मुस्कुरा दीं।

“और क्या ऐसा ही समझ लो कि जो चीज़ भगवान को अच्छी लगी वो भगवान ने अपने पास ऊपर भी रख ली और ताकि हम उस चीज़ को देखकर न ललचायें इसीलिए कुछ तारे टिम-टिम करते हुए पृथ्वी पर भी छोड़ दिए”, दादी ने स्नेहपूर्वक कहा।

“दादी कितना अच्छा होता न कि जैसे माँ-बाबूजी भगवान को अच्छे लगे और उन्होंने ले लिए वैसे ही वो जुगनुओं की तरह उनको वापस भी कर देते।” अब दादी ये सुनकर एकदम ख़ामोश हो गयीं। इस एक प्रश्न ने उन्हें अन्दर तक चीर दिया। आख़िर उन्होंने भी अपने बेटे-बहू को खोया था। अचानक उनका गला जैसे बँध-सा गया। कुछ जवाब ही नहीं था इस प्रश्न
का उनके पास। माधव छोटा था, पर समझदार भी था। आख़िर वक़्त से पहले उसने कितना कुछ सह लिया था। तभी उसने कहा, “मगर दादी, इस बार भी भगवान ने तारों को लेकर जुगनू मेरे लिए भेज दिये।” इस पर दादी कुछ समझ नहीं पायीं, “क्या मतलब?”, उन्होंने अपने गले से शब्दों को निकालते हुए कहा।

“ठीक जिस तरह जुगनू तारों की तरह टिमटिमाते हैं और सामने उस पेड़ को इतना सुन्दर बना देते हैं, ठीक उसी तरह मेरे लिए आप और दादाजी ही जुगनू हैं जो उन्हीं की तरह मेरी चिन्ता करते हैं और जिन्होंने मुझ मामूली पेड़ को उस सामने वाले पेड़ की तरह सजा दिया।” यह सुनते ही दादी की आँखों में आँसू आ गये और उन्होंने अपने पोते को गले से लगा लिया।

सच में यही तो होता है। अगर आप कभी भी अपनी ज़िन्दगी से कुछ तारों को खो देते हैं तब उन तारों की कमी खलती ज़रूर है। मगर भगवान कुछ जुगनू उनकी जगह ज़रूर भेज देते हैं, चाहे इंसान के रूप में या किसी वस्तु के रूप में। बस पहचान हमें ही करनी है कि तारों को खो देने के बाद भगवान ने किन्हें उनकी जगह जुगनू बनाकर हमारे लिए भेजा है। अभी भी वही पुरवैया चल रही थी मगर अब वह शरीर से ज़्यादा मन को शान्ति दे रही थी। दादी की आँखे नम तो थीं मगर अपने पोते के लिए मुस्कान अभी भी होंठों पर सजी हुई थी और अभी भी तारे टिमटिमा रहे थे, जिनकी दूरी पूरी करने के लिए जुगनू अभी भी हवा में मँडराकर थोड़ी-सी ही सही, लेकिन इस जहान को रौशनी दे रहे थे।

कहानी: उत्कर्ष जैन ‘जुगनू’

One thought on “जुगनू

  1. बहुत अच्छे विचार उत्कर्ष….!! दुआ है कि तुम्हारी लेखनी ऐसे ही चलती रहे और तुम इन जुगनुओं से भी ज़्यादा चमक के साथ टिमटिमाते और चमचमाते रहो….😊😇

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