जोखनी की माँ

आज सुबह सवेरे आदतन व्हाट्सऐप खोलते ही ये तस्वीर दिखी। वैसे तो अक्सर उम्रदराज़ औरतों की छवि ऐसी ही होती है पर इसमें कुछ तो ख़ास था जो अनायास ही मुझे अपनी ओर खींचे ले रहा था। ऐसा लग रहा था कि अभी ये छवि जीवन्त हो उठेगी और मुझे पुकार उठेगी… “मईयाँ….!” इस शब्द के कानों में गूँजते ही बहुत कुछ साफ़ हो गया।”अरे….! ये तो बिल्कुल जोखनी की माँ जैसी है !!” मुझे ज़ोर से ये बात हँसकर बोलते देख इन्होंने अख़बार से नज़रें उठा चश्मे के ऊपर से घूरा जैसे पूछ रहे हों कि बेगम सब खैरियत तो है, अब जोश में कहीं उछल कर अपनी टाँगों में मोच न ले आना । पर मैंने इनकी इस दृष्टि का बिल्कुल बुरा न माना क्योंकि इन्होंने जोखनी की माँ को देखा ही कहाँ था।

‘जोखनी की माँ’ दरअसल हमारे घर की ‘आपातकालीन सुविधा’ थी जो हमारी कामवाली बाई के अचानक काम पर न आने से चार बच्चों वाले घर में मची अफ़रातफ़री को कम करने में अम्मी का हाथ बँटा देती थी । वो मुझे और मेरी बहनों को ‘मईयाँ’ कहती थी। बिहार में (जो अब झारखण्ड है) लड़कियों को प्यार से ‘मईयाँ’ बुलाते हैं। ‘जोखनी’ दरअसल उसकी बेटी का नाम था और इसी कारण उसका नाम ‘जोखनी की माँ’ पड़ गया था। वह हमारे घर के ठीक बगल वाले घर में रहती थी। घर तो किसी और का था वो तो बस उसकी बाईं तरफ के हिस्से में बाहर की तरफ फूस का छप्पर डाल कर रहती थी। यानी उसके भाग्य में एक कमरा भी न था । उस समय मैं शायद सातवीं कक्षा में पढ़ती थी इसलिए बहुत अच्छी तरह तो याद नहीं पर यह ज़रूर ध्यान है कि उसका एक बेटा था जो उसे अकेला छोड़कर अपनी पत्नी के साथ कहीं और रहता था। यानी 40 साल पहले भी समाज के संस्कार आज जैसे ही थे। कहीं कुछ खास नहीं बदला।

जोखनी की माँ बिल्कुल अकेली उस घर में रहती थी। पति था जो हमेशा शराब पी कर आता और हंगामा करता पर जोखनी की माँ उसे झाड़ू से मार-मार कर भगा देती थी। उस समय तो कुछ समझ में नही आता था पर आज उसकी पीठ थपथपाने का मन करता है क्योंकि जो साहस हम उच्चवर्गीय लोग नहीं कर पाते वो उसने उस समय कर दिखाया था जब उसके अपने रहने और खाने-पीने का भी कुछ ठिकाना नहीं था। पति और बेटा बहू भले ही साथ न हो पर उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था।मुझे याद है कि कि अक्सर उसे अपने खाने-पीने की चिन्ता भी नहीं रहती थी। जब उसके पास कुछ नहीं रहता तब वह हमारे घर आती और पूछती कि हमारे पास ‘बिलाती’ है। क्या .?? दरअसल वो टमाटर माँगती थी। टमाटर को उस समय ‘विलायती’ भी कहा जाता था जो कि उसकी ज़बान में ‘बिलाती’ था।

मैं अक्सर उससे पूछ बैठती…”जोखनी की माँ, इस बिलाती का तुम क्या करोगी?”

वह मुस्कुरा कर कहती…”ई ठो आग में भून लेंगे और नून, लाल मिर्ची और सरिसों के तेल डाल के चटनी बना लेंगे।”

“फिर इसका क्या करोगी….?” मेरी जिज्ञासा बढ़ जाती।

“का करबइ…भात में मैस-मैस के ( मिला मिला के ) खैबइ आउ का करबइ…”

“और सब्जी -दाल….?” मैं प्रश्नों की बौछार करती रहती।

“ऊ कहाँ से मिलतई…. भातो मिल जा रहा है ओ ही बहुत सुकर है। कभी ई टमाटर के चटनी खा के देखा…केत्ता सुआद है।”

मैं आश्चर्य से उसे देखती रहती और उसके मन के चैन का सोचती जो भात-चटनी खाकर ही खुश था। उसका वह ठिकाना जिसकी दीवारें भी नही थीं। केवल फूस का एक छप्पर था। उसी के नीचे शीतल पवन के झोंकों का मज़ा लेकर चैन की नींद सोती और वहीं फटी चादर टाँग कर पर्दा कर नहा-धो लेती। एक ओर कोने में मिट्टी का एक चूल्हा बना था जिसपर उसके स्वादिष्ट व्यञ्जन बनते। पास में ही एक चटाई पर वो सोती और कपड़ों की एक गठरी थी जो सिरहाने पड़ी रहती थी। बस यही कुल कायनात थी उसकी उसके महल में। जब बारिश होती तो छप्पर के पुआल से पानी बूँद-बूँद टपकता और वह बैठ कर उसे निहारती जैसे कोई मनोरम दृश्य हो!

हम बुद्धिजीवी सोचते हैं कि जोखनी की माँ जैसे न जाने कितने लोग हैं जो दुनिया में आते हैं और कीड़े-मकोड़ों सी ज़िन्दगी बसर कर चले जाते हैं । पर यह हमारी भूल है। हमारे पास तो ऐसी आँख ही नहीं जो देख पाए कि हम जब एक सामान्य तीन कमरों के फ़्लैट के बाद फिर बड़ी सोसायटी में फ़्लैट बनाते हैं और फिर उससे भी से असन्तुष्ट होकर एक अपना अकेले का मकान बनाकर भी वह सुख-शान्ति नही ढूँढ पाते जो जोखनी कि माँ को उस छप्पर तले मिलती थी। उसकी टमाटर की चटनी के सामने हमारे पिज़्ज़ा, बर्गर, बिरयानी और थाई खाने सब बेस्वाद हैं। हमारे पास सारे साज़-ओ-सामान होकर भी हमें और अधिक पाने की चिन्ता सताती रहती है जबकि वह अपनी गठरी में ही मस्त थी। सलाम करती हूँ मैं उसके स्वाभिमान को जो उसने एक शराबी पति के साथ न रहकर अकेले रहने की हिम्मत की और समाज के ठेकेदारों की टीका टिप्पणी का कोई असर अपने व्यक्तित्व पर न पड़ने दिया। कितनी शक्तिशाली सोच थी उसकी जब वो कहती थी … “ए मईयाँ…जरा हमको बताओ तो…ई ससुर मउलाना जो हमरा सिखावे है कि बुढ़वा को काहे भगा देती है तो हम पूछब ओकरा के जब बुढ़वा हमरा सरीर मार-मार के नीला कर देवेला तब ऊ ओकरा के काहे न समझावे है कि सराब पीना मुसलमान के हराम बोल के गइन हैं मुहम्मद साहिब… सब कानून हम औरतियन के लिए ही बा … हमरा बस चले त ऊ मउलाना के भी दू लप्पड़ धर दें ….हाँ नहीं तो।”

आज जब समाज के हर तबके में आये दिन सुहागिनों के लाल सिन्दूर के पीछे नीले धब्बे नज़र आते हैं, घर के बच्चे जब सहम कर शराबी बाप के डर से कोनों में दुबके नज़र आते हैं और बहू-बेटों के घर छोड़कर चले जाने पर निढाल माँ-बाप अपनी किस्मत पर रोते हैं तो मुझे जोखनी की माँ बहुत याद आती है और मैं सोचती हूँ कि काश वह मुझे बचपन में नहीं बल्कि आज होश-ओ-हवास में मिली होती तो मैं उसे न जाने कितनों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना पाती !!

कहानी: शगुफ़्ता जबीं

चित्र: कशिश सेठ

3 thoughts on “जोखनी की माँ

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