ख़ुदा की चाल

अगर सोचो हक़ीक़त में,
ख़ुदा की चाल निकली तो..
हमारा साँस लेना क्या पता मालूम करना हो !
कि जैसे हम..
हर इक शय जाँचते हैं और परखते हैं..
ख़ुदा हमको बनाकर उम्र भर बस देखता हो तो !

अगर उसकी निगाहों में ग़लत शय हम भी निकले तब,
हमारे साँस लेने का कोई मतलब न निकला जब !
ख़ुदा जो देख कर सोचे,
नहीं वो बात रचना में,
तभी साँचा बदल दे वो,
हमें फिर से बनाने को..

किसी दिन रोज़ के जैसे..
भरी लेकिन न छोड़ी तो,
हमारी साँस का पैंडा अधूरा ही रहेगा तब।

मगर जो जी रहे थे हम,
जिसे जीवन समझते थे,
ख़ुदा का खेल था सारा..
था जीवन ही नहीं वो तो।

कहे कोई ख़ुदा से ये,
हमें फिर से नहीं बनना,
सफ़र फिर से नहीं करना,
सफ़र में क्या नहीं देखा,
कई रातें भयानक थीं,
कई दिन थे, जो क्यूँ ही थे,
सभी रिश्ते सभी नाते निभाए हैं मगर अब बस,
ख़ुशी से आज तक ग़म को सहा लेकिन न जाना था,
कि सारे ग़म तो हमको जाँचने का एक ज़रिया थे,
कि हम जो सोचते थे वो ख़ुदा सब नोट करता था,
तभी इक दिन, तभी इक दिन..
हुआ ऐसा कि वो आई जिसे सब मौत कहते हैं..
कि मतलब हम ख़ुदा के टेस्ट में अब फ़ेल होकर फिर..
चले थे दूसरे साँचे..ख़ुदा ने ली नई मिट्टी..नए साँचे में भर कर के..
लगा फिर से मुसीबत को तरीक़े से बनाने वो..

अगर सोचो हक़ीक़त में,
ख़ुदा की चाल निकली तो..

अगर वो जान कर के..बूझ के.. करता हो ऐसा तो,
पुरानी मिक्स करता हो, नई मिट्टी में तो सोचो,
ज़रुरी तो नहीं उसका हमेशा ही लगे रहना,
उसे क्या फ़र्क पड़ता है, कि हम कैसे भी निकलें.. पर..
उसे करना वही है जो भी उसने सोच रक्खा है..
उसे फिर से बनाना है, हमें फिर से बनाना है, बनाते ही तो जाना है..
किसे मालूम उसको क्या मज़ा आता है ये कर के..
मगर ये भी हो सकता है…कहीं ये बात निकली तो ?
उसे गर बस यही इक काम करने का पता हो तो ?
तो फिर अब बात ऐसी है..
ज़रा सोचो तो सीधी है..
सभी जीवन हमारे बस कटे हैं फ़ेल हो कर के..
ख़ुदा करता नहीं है पास, अपने पेट की ख़ातिर..
चलो इस बात को मानें कि ये जीवन नहीं जीवन..
नहीं होगा कभी कोई हमारा अस्ल में जीवन..
ख़ुदा शतरंज-ए-जीवन में हमेशा ‘चेक’ ही देता है,
रखें हम पाँव जिस ख़ाने, वहीं पर मात निश्चित है।

अगर सोचो हक़ीक़त में,
हमारा सोचना ऐसा भी उसकी चाल निकली तो !
ख़ुदा ने सोच रक्खा हो अलग जीवन हमारा तो !
ख़ुदा की सम्त को मंज़र अज़ल से ही तो ऐसा है..
क़लम पकड़े वो हर दम ही ज़मीं की ओर तकता है..
ख़ुदा लेकर के बैठा है,
‘पुरानी और नई मिट्टी’।

©️ Credits:
शब्द: पुलकित शर्मा
चित्र: शुभ्रजित चौधरी

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