दादी का घर!

5नारी का प्रत्येक स्वरूप अपने आप में उत्कृष्ट है। फिर भी उसका मातृभाव उसकी ओर देखने वाले की नज़र को ज़्यादा सुकूनदेह लगता है। हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, “माँ” का कद उसी अनुपात में हमारे मन में बढ़ता जाता है। हम उसके साथ रहने तक उसकी अहमियत पर उतना ध्यान नहीं दे पाते हैं जितना उससे दूर जाने पर यक-ब-यक वह याद आती रहती है। ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि उसके पास होने पर हम निश्चिन्त महसूस करते हैं जो उससे दूर जाने पर नहीं कर पाते। मगर ऐसा होते हुए भी हम अपनी एक नयी दुनिया में धीरे-धीरे रमने लगते हैं। यहाँ अब कुछ फ़र्क आता है। माँ की दुनिया उम्र के साथ अक्सर अपने बच्चों तक ही सिमटने लगती है।

एक स्त्री की नश्वर देह समय के साथ अवश्य बूढ़ी होती है, किन्तु उसका ममत्व उसी गति से और गहरा होता जाता है। एक भरे-पूरे परिवार वाली आज के इस दृष्टान्त की वह नायिका भी अपने उस बेटे के परिवार को ज़्यादा याद करती है जो उससे दूर रहता है। साथ रहने वाले बेटे का परिवार कभी-कभी इस बात से व्यथित भी होता है। मगर माँ तो माँ ठहरी, क्या कीजे! हर साल छुट्टियों के समय वह अपने उन्हीं बेटे-बहू और पोते-पोती की बाट जोहती है। फ़ोन पर लगभग रोज ही बात होती है लेकिन उसकी निगाहों को तसल्ली नहीं होती।

वहाँ दूसरे शहर में उसकी बहू है। वह साल भर नौकरी करती है और अपनी कमाई का एक हिस्सा अपनी सास के लिए भी रखती है। उसी सास के लिए जिसके मन में हमेशा अपने बेटियों और बहुओं के उच्च-शिक्षा प्राप्त करने के अरमान थे। उसी सास के लिए जिसने अपने बच्चों की पढ़ाई से कभी कोई समझौता नहीं किया और उन्हें एक बेहतर भविष्य के लायक बनाया।

अब बेटे-बहू और पोते-पोती की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं। दोनों बच्चों के मन में इस बात को लेकर बहुत उत्साह है। दोनों भाई-बहन दिन भर अपनी योजनाएँ बनाते रहते हैं। जाने की तैयारियाँ लगभग पूरी होने को हैं। अगले दिन रवानगी है। तभी बात ही बात में बच्चे अपनी माँ से पूछ बैठते हैं, “कल दादी के घर पहुँच जायेंगे न?” उनकी माँ एकदम से पलटती है, “दादी के घर नहीं बेटा, बस घर..अपने घर..!!”

इससे आगे शायद कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। असली सास-बहू ऐसी होती हैं, टीवी सीरियलों वाले नकली और खोखले किरदारों से एकदम अलग। यह भारतीयता है, भारतीय आचार है, भारतीय परिवार है। इसे नारी ने ही सींचा है, नारी ने ही सहेजा है। बहुत सारी खामियों के बावजूद इस देश में आज भी ऐसे संस्कार जीवित हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि हमारे माता-पिता हमारे साथ नहीं रहते, हम उनके साथ रहते हैं। वे जहाँ हैं, घर वहीं है। उन दोनों भाई-बहन को अपनी माँ का कहना हमेशा याद रहता है। और राह तकती दादी या माँ के पास जाते हुए वे अपने दोस्तों से यही कहकर जाते हैं कि वे “अपने घर” जा रहे हैं।

हमारे घर ऐसे ही बने रहें! एवमस्तु! 🙂

चित्र – मृणाल चन्द्र देबनाथ
शब्द – अर्यमन चेतस पाण्डेय

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s