ख़ूनी हस्ताक्षर . .

आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष के महनीय यज्ञ में दी गयी पूर्णाहुति के समान था। हजारों की सेना “दिल्ली चलो” के उद्घोष के साथ बर्मा के रास्ते मणिपुर की तरफ कूच कर गयी थी और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” जैसे आह्वान को सुनकर उन दिलेरों ने मानो भारत-माता के चरणों का लाल महावर से शृंगार ही किया था। नेताजी के उन्हीं जोशीले उत्प्रेरक वचनों को कवि गोपालप्रसाद व्यास ने कविता में ढाला है। इसे पढ़कर महसूस होता है कि कैसे उस समय देश की स्वाधीनता के लिए बलिदान होना उत्सव-तुल्य होता था। बचपन में हम सभी ने इसे पढ़ा है। आज उन्हीं स्मृतियों को ताज़ा करने का सुअवसर है, पढ़िए, पढ़ने को प्रेरित कीजिये…

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वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं!
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं!

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं है, पानी है!

उस दिन लोगों ने सही-सही खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में माँगी उनसे क़ुरबानी थी

बोले, “स्वतन्त्रता की खातिर बलिदान तुम्हें करना होगा
तुम बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा

आज़ादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जाएगी
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जाएगी

आजादी का संग्राम कहीं पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा नंगे सर झेला जाता है..”

यूँ कहते-कहते वक्ता की आँखों में खून उतर आया
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया

आजानुबाहु ऊँची करके वे बोले, “रक्त मुझे देना
इसके बदले भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना”

हो गई सभा में उथल-पुथल, सीनों में दिल न समाते थे
स्वर इंकलाब  के नारों के कोसों तक छाए जाते थे

“हम देंगे, देंगे खून” – शब्द बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे

बोले सुभाष, “इस तरह नहीं बातों से मतलब सरता है
लो यह कागज़, है कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरने वाले जन को सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन, मन, धन और जीवन माता को अर्पण करना है

पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है
इस पर तुमको अपने तन का कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है

वह आगे आए जिसके तन में भारतीय खूँ बहता हो
वह आगे आए जो अपने को हिन्दुस्तानी कहता हो

वह आगे आए जो इस पर ख़ूनी हस्ताक्षर देता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो!”

सारी जनता हुंकार उठी- “हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो हम अपना रक्त चढाते हैं!”

साहस से बढ़े युबक उस दिन देखा, बढ़ते ही आते थे
चाकू-छुरी-कटारियों से वे अपना रक्त गिराते थे

फिर उसी रक्त की स्याही में वे अपनी कलम डुबाते थे
आज़ादी के परवाने पर हस्ताक्षर करते जाते थे

उस दिन तारों ने देखा था हिन्दुस्तानी विश्वास नया
जब लिखा महारणवीरों ने ख़ूँ से अपना इतिहास नया

…   …   …

~~गोपाल प्रसाद व्यास~~

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