स्त्रीत्व और पुरुषत्व

स्त्री सृष्टि की जिजीविषा को मूर्त रूप देने वाली है।फिर उसका पोषण भी करने वाली है।स्त्री प्रकृतिस्वरूपा है, निसर्गतः माननीया है। उसे माँ कह कर पूज्या समझना बहुत अच्छा है। लेकिन इसकी ओट में उसके बाकी किरदारों के सम्मान का हक़ मारना हमारे समाज की मूल खामी है। 800px-Three_faces_on_a_Wall_in_Bahar_Darबहन के रूप में फिर भी उसकी कुछ परवाह की जाती है, मगर वो भी एक ख़ास उम्र के बाद, जब उसकी कमी महसूस होने लगे, तब। पत्नी को कहने को बराबर का दर्जा दे दिया गया है। व्यवहार तो एकदम विपरीत दिखता है। परिवार और समाज के आर्थिक तथा बौद्धिक स्तर के साथ इस सम्बन्ध के मूक शोषण का स्तर और तरीका भी बदलता रहता है, लेकिन यह हर जगह मौजूद है। कहने को तो सहचरी है, मगर व्यवहार में उसे अनुचरी समझा जाता है। बेटी बेशक जब प्यार पाती है तो कलेजा भर-भर पाती है, मगर साथ ही पराया धन ही कहाती है। कभी यह बात सही भी थी, आज नहीं है।अब समाज की व्यवस्था और ढाँचे में परिवर्तन हो चुका है। सो इसे बदले जाने की गम्भीर ज़रूरत है। साथ ही हम यह भी न भूलें कि हमारे ही समाज में सबसे ज्यादा कन्या-भ्रूणहत्या होती है। और, मित्र के तौर पर तो हम ख़याल तक में भी एक सामान्य माधुर्यपूर्ण सम्बन्ध की मान्यता स्त्री को आज तक नहीं दे पाए हैं।

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अपने चारों ओर ही देखिये, गुटों में बैठकर स्कूल-कॉलेज के लड़कों से लेकर ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँचे हुए लोग भी कैसी-कैसी भद्दी, फूहड़ और अश्लील बातें करते हैं। और इन बातों का शिक्षित होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। यह मनःस्थिति ही ऐसी है, दुनिया के हर समाज में। हम जानते-बूझते भी अनजान हो जाते हैं।

सारी गड़बड़ पुरुष के दिमाग की उपज है जिसका ठीकरा महिला को सम्मान और मर्यादा का प्रतिमान बनाकर उसपर फोड़ दिया जाता है। इसे दुरुस्त करने का एक ही उपाय है कि हर पुरुष खुद को और अपने साथियों की हरकतों और सोच को दुरुस्त करे। स्त्रियों के बारे में जिस तरह की बातें लोग ग्रुप में बैठकर किया करते हैं वह एक बनी-बनाई “पुरुषत्व ” की “छवि” को सन्तुष्ट करने के लिए की जाती हैं।

यहाँ भाषा अहम् भूमिका निभाती है क्योंकि वह केवल विचार के सम्प्रेषण का माध्यम नहीं है अपितु विचार को अवचेतन में स्थापित करने का माध्यम भी है। इस तरफ बचपन से ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। हमारी दिक्कत है कि हमें सिर्फ “महसूस किये जा सकने वाले” कारण ही महत्वपूर्ण लगते हैं। यह दिक्कत युवावर्ग में सबसे ज्यादा है। मस्ती-मज़ाक के चक्कर में कब हम ऐसी बातों को बड़े सामान्य तरीके से लेने लगते हैं, हमारा दिमाग समझ ही नहीं पाता।फिर इन्हीं में से कुछ दिमाग अपराधों को जन्म देते हैं।

ऐसा बिलकुल नहीं है कि सभी दिमाग फिर आपराधिक ही हो जाते हों। लेकिन सुलझे हुए और संतुलित दिमाग वाले बहुसंख्यक पुरुष भी आखिरकार मोमबत्ती मार्च के अलावा कर क्या पाते हैं..?? कुछ भी तो नहीं। मोमबत्तियों की लौ की रोशनी में दो-चार दिन देश उछलता है, फिर शान्त हो जाता है। शान्त ही होगा भी। क्योंकि जीवन का नियम है चलते रहने का।एक जीवन नष्ट होते हुए अपने एकदम करीबी कुछ जिन्दगियों को छोड़कर और किसी को प्रभावित नहीं करता है। बाकी लोग संवेदना व्यक्त कर अपनी-अपनी चर्या में पुनः रत होंगे ही, उन्हें होना पड़ेगा। अतः पुरुषत्व की इसी मिथ्या पहचान को दिमाग से साफ़ कीजिये बस, सारे कूड़े-कचरे की जड़ वहीँ है। बाकी सब फिर अपने आप धीरे-धीरे ठीक होने लगेगा।

Rohit (16)और साथ ही ज़रूरत यह भी है टीवी और फिल्मों वाले भी अपनी ज़िम्मेदारी समझें। औरत के शरीर को बाज़ार के सामान की तरह प्रस्तुत करने से बाज आयें। इनके TRP के व्यापार के कारण बड़ा बेड़ा गर्क हुआ है। सास-बहू के रिश्ते को तो न जाने क्या बताते हैं ये लोग। इसलिए सबसे ऊपर है कि हम अपना विवेक नष्ट-भ्रष्ट न होने दें। और यह एक बात ऐसी है जिसमें नारी खुद भी एक हद तक दोषी है। स्कूल-कॉलेज की लड़कियों की आपस की बातें कभी कान में पड़ें तो मालूम होगा कि उनमे भी खुद को “माल” कहलवाने की बड़ी चाह होती है। १६ दिसंबर २०१२ के बाद के जुलूसों में एक तख्ती लिए एक लड़की थी जिस पर लिखा था – “मेरी आवाज़ मेरी स्कर्ट से ज़्यादा ऊँची है”। आवाज़ तो बुलन्द और ऊँची होनी भी चाहिए। दबने वाली होगी तो समाज तो पहले ही दबा रहा है। मान लिया जी। काबिले तारीफ़ बात है। लेकिन इसके साथ जुडी एक और बात है।यह तुलना कितनी अजीब है, “आवाज़ और स्कर्ट”..!! यहाँ फिर भाषा और आचरण प्रासंगिक हो उठते हैं। यह एक और गड़बड़ है। हम ऐसे लोग हैं जो एक गलत को गलत कहने के लिए दूसरे गलत को सही सिद्ध करने लगते हैं।हम देह के उत्तेजक और अनावश्यक प्रदर्शन को आज़ादी के नाम पर सही नहीं ठहरा सकते हैं। कहीं न कहीं इसके पीछे स्त्री मन की अपने प्रति आकर्षण प्राप्त करने की एक विद्रोह मिश्रित चाह भी है जो उसे खुद को किसी “भोग्या वस्तु” की तरह दिखने-दिखाने को गलत नहीं मानती। और यही वह बिन्दु है जहाँ से पुरुषवर्ग स्वयं को अपने निर्दोष होने और स्त्रीवर्ग के दोषी होने की दलीलें देने लगता है। और मीडिया के युग में पीड़िता के स्वर में इस तथ्य को मौन कर दिया जाता है। समस्या के उस स्वर को मुखर होने देना अत्यावश्यक है, मगर साथ ही उसके एक गम्भीर कारण के स्वर को मंच देना भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि समाज दोनों से मिलकर ही बनता है। यहाँ सनद रहे कि पुरुष की नारी के वस्त्रों पर की जाने वाली टिप्पणियों या फब्तियों के पक्ष में कोई बात नहीं कही गयी है। पुरुष को स्त्री के लिए आचार संहिता बनाने से अधिक आत्म-नियन्त्रण और संयमित आचरण की आवश्यकता है।

यहाँ से आगे फिर एक तरह के वर्ग-संघर्ष का विवाद चलने लगता है, और विवाद ही बन कर रह जाता है। जहाँ दो वर्ग होते हैं, वहाँ श्रेष्ठता की स्पर्धा रोकना असम्भव है। पुरुष तो स्त्री को भोग्या समझता ही रहा है।तो स्त्री खुद ही अपने आप को ऐसा क्यों समझती है। तो हमें एक समाज के तौर पर अमल करने के लिए अब दोनों बातें समझनी हैं – एक, अपना “जोर” दिखाने से “पुरुषत्व ” में इजाफ़ा नहीं होता। दो, खुद को “माल” दिखाने से “स्त्रीत्व ” में बढ़ोतरी नहीं होती। और सबसे ज़रूरी, युवा लड़के-लड़कियाँ इन बातों का मर्म और महत्व समझें।एक आखिरी बात और। महिला अधिकारों और कानूनों की आड़ में उनका अनुचित लाभ उठाने से महिलाओं ही की हानि हो रही है।दहेज विरोधी कानून और घरेलू हिंसा विरोधी क़ानून सबसे अधिक दुरुपयोग किये जाने वाले कानूनों में से हैं। ऐसे घर भी बहुत से हैं जहाँ पतियों की घिग्घी बंधी रहती है। उन घरों में बाहर से देखने को समानता लगती है, अन्दर से दूसरे तरह की असमानता होती है। इसलिए “सारे मर्द एक जैसे होते होते हैं” और “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी मानसिकताओं को भी त्यागने का समय है। स्त्री, स्त्री रहे।पुरुष, पुरुष रहे।इसी में समाज का सौन्दर्य है, इसी में विकास का मूल है। इस लेख का तात्पर्य कोई विचारधारा बनाने का नहीं है, और न ही किसी तथ्य के पक्ष-विपक्ष में तर्क करने का है। उद्देश्य है कि जिन बातों को हम रोज़मर्रा के जीवन में घटते देखते हैं, उनके सन्दर्भ में युवावर्ग कुछ आत्मावलोकन करे।

हम इस गम्भीर तथ्य के मर्म को समझने वाले हों..!! शिवमस्तु..!! 🙂

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